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mahabharat 3.313.128: युधिष्ठिर ने कहा, "यदि धर्म का नाश हो जाए, तो वह नष्ट हुआ धर्म कर्ता का भी नाश कर देता है। और यदि उसकी रक्षा हो जाए, तो वही धर्म कर्ता की भी रक्षा करता है। इसीलिए मैं धर्म का त्याग नहीं करता, कहीं ऐसा न हो कि वह नष्ट होकर मेरा भी नाश कर दे।" 128   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 128
 
 
श्लोक  3.313.128 
युधिष्ठिर उवाच
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित:।
तस्माद् धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥ १२८॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा, "यदि धर्म का नाश हो जाए, तो वह नष्ट हुआ धर्म कर्ता का भी नाश कर देता है। और यदि उसकी रक्षा हो जाए, तो वही धर्म कर्ता की भी रक्षा करता है। इसीलिए मैं धर्म का त्याग नहीं करता, कहीं ऐसा न हो कि वह नष्ट होकर मेरा भी नाश कर दे।" 128
 
Yudhishthira said, "If Dharma is destroyed, then that destroyed Dharma destroys the doer as well. And if it is protected, then that same Dharma protects the doer as well. That is why I do not abandon Dharma, lest it be destroyed and destroy me." 128.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)