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mahabharat 3.313.118: इस महा मायारूपी कड़ाहे में भगवान काल सूर्यरूपी अग्नि तथा दिन-रातरूपी ईंधन की सहायता से, मास और ऋतुरूपी कलछी से उलट-पलट कर समस्त प्राणियों को पका रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  3.313.118 
अस्मिन् महामोहमये कटाहे
सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन।
मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन
भूतानि काल: पचतीति वार्ता॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
इस महा मायारूपी कड़ाहे में भगवान काल सूर्यरूपी अग्नि तथा दिन-रातरूपी ईंधन की सहायता से, मास और ऋतुरूपी कलछी से उलट-पलट कर समस्त प्राणियों को पका रहे हैं।
 
In this cauldron of great illusion, Lord Time is cooking all living beings with the help of the fire in the form of the Sun and the fuel in the form of day and night, by turning them over with the ladle in the form of months and seasons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)