श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  3.313.102 
युधिष्ठिर उवाच
यदा धर्मश्च भार्या च परस्परवशानुगौ।
तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगम:॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - जब धर्म और पत्नी - ये दोनों परस्पर विरोधी न होकर पुरुष के वश में होते हैं, तब धर्म, अर्थ और काम - इन तीनों परस्पर विरोधी वस्तुओं का साथ-साथ रहना सहज हो जाता है।*॥102॥
 
Yudhishthira said - When Dharma (righteousness) and wife - both of them are in the control of a man, being non-contradictory, then it becomes easy for Dharma, Artha (wealth) and Kama (desire) - these three contradictory things to live together.*॥102॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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