श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 313: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.313.1 
वैशम्पायन उवाच
स ददर्श हतान् भ्रातृृँल्लोकपालानिव च्युतान्।
युगान्ते समनुप्राप्ते शक्रप्रतिमगौरवान्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिर ने देखा कि इन्द्र के समान तेजस्वी उनके भाई सरोवर के तट पर मृत पड़े हैं, मानो प्रलयकाल में जगत के सभी रक्षक अपने लोकों से गिर पड़े हों॥1॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Yudhishthira saw his brothers, as glorious as Indra, lying lifeless on the bank of the lake, as if during the time of deluge all the guardians of the world had fallen from their worlds.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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