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mahabharat 3.312.d1h-45: उस सरोवर का जल कमल की लताओं से आच्छादित था और उसके चारों ओर सिन्धुवार, बरगद, केवड़े, करवीर और पीपल के वृक्ष लगे हुए थे। उस समय अपने भाइयों से मिलने के लिए उत्सुक धर्मपुत्र युधिष्ठिर थके-मांदे उस सरोवर के पास आए और वहाँ की दशा देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। 45।   |   mahabharat अध्याय 3.312: पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 312: पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना  »  श्लोक d1h-45
 
 
श्लोक  3.312.d1h-45 
उपेतं नलिनीजालै: सिन्धुवारै: सवेतसै:।
केतकै: करवीरैश्च पिप्पलैश्चैव संवृतम्।
(ततो धर्मसुत: श्रीमान् भ्रातृदर्शनलालस:।)
श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्ट्वाथ विस्मित:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
उस सरोवर का जल कमल की लताओं से आच्छादित था और उसके चारों ओर सिन्धुवार, बरगद, केवड़े, करवीर और पीपल के वृक्ष लगे हुए थे। उस समय अपने भाइयों से मिलने के लिए उत्सुक धर्मपुत्र युधिष्ठिर थके-मांदे उस सरोवर के पास आए और वहाँ की दशा देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। 45।
 
The water of that lake was covered with lotus vines and on all its four sides, sinduwar, banyan, kevada, karveer and peepal trees surrounded it. At that time, Yudhishthira, the son of Dharma, who was eager to meet his brothers, came to that lake exhausted and was very surprised to see the condition there. 45.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिपतने द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदि चारों भाइयोंके मूर्च्छित होकर गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला तीन सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/२ श्लोक हैं।)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)