श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 312: पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  3.312.37-38 
अमन्यत महाबाहु: कर्म तद् यक्षरक्षसाम्।
स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै॥ ३७॥
पास्यामि तावत् पानीयमिति पार्थो वृकोदर:।
ततोऽभ्यधावत् पानीयं पिपासु: पुरुषर्षभ:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
बलवान भीमसेन ने मन में निश्चय किया कि ‘यह यक्षों और राक्षसों का काम है।’ फिर उन्होंने सोचा; ‘आज तो मुझे शत्रुओं से युद्ध करना ही पड़ेगा, इसलिए पहले मुझे जल पी लेने दो।’ ऐसा निश्चय करके प्यास से व्याकुल, पुरुषोत्तम कुन्तीपुत्र भीमसेन जल की ओर दौड़े।
 
The powerful Bhimasena decided in his mind that 'this is the work of the Yakshs and the Rakshasas.' Then he thought; 'Today I will certainly have to fight with the enemy, so first let me drink some water.' Having decided thus, the thirsty Bhimasena, son of Kunti, the best of men, ran towards the water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)