श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 312: पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  3.312.30-31h 
कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन् भरतर्षभ।
स त्वमोघानिषून् मुक्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडित:॥ ३०॥
अनेकैरिषुसङ्घातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह।
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उस समय अर्जुन कर्णी, नालिका और नाराच आदि बाणों की वर्षा कर रहे थे। प्यास से व्याकुल अर्जुन ने अनेक अमोघ बाणों का प्रयोग करके उन्हें आकाश में अनेक बार बरसाया।
 
O best of the Bharatas, Janamejaya! Arjuna was then showering arrows like Karni, Nalika and Narach. Arjuna, suffering from thirst, used many infallible arrows and showered them in the sky many times. 30 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)