श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 311: ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थन-काष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दु:खी होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.311.18 
तेषां प्रयतमानानां नादृश्यत महामृग:।
अपश्यन्तो मृगं शान्ता दु:खं प्राप्ता मनस्विन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
बहुत प्रयत्न करने पर भी वे उस विशाल मृग को पकड़ न सके; वह अचानक अदृश्य हो गया। मृग को न देख कर वे वीर और पराक्रमी निराश और दुःखी हो गए।
 
In spite of great efforts, they could not catch the great deer; it suddenly disappeared. Not seeing the deer, the brave and brave became disheartened and sad.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)