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श्लोक 3.310.d2  |
(प्रत्याजग्मु: सरथा: सानुयात्रा:
सर्वै: सार्धं सूतपौरोगवैस्ते।
ततो युयुर्द्वैतवने नृवीरा
निस्तीर्यैवं वनवासं समग्रम्॥ ) |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार, सम्पूर्ण वनवास काल व्यतीत करने के पश्चात, वीर पाण्डव अपने रथों, अनुयायियों, सारथि तथा रसोइयों के साथ द्वैतवन लौट आये। |
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| Thus, after spending the entire period of exile, the valiant Pandavas returned to Dwaitavan along with their chariots, followers, charioteer and cooks. |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि कवचकुण्डलदाने दशाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३१०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कवच-कुण्डलदानविषयक तीन सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१०॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/२ श्लोक हैं) |
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