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mahabharat 3.310.d1h-9: राजन! जब उन दोनों में श्रेष्ठ ने कर्ण के सुखदायक कवच और कुण्डलों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं माँगा, तब राधानन्दन कर्ण ने हँसकर उनसे कहा- ॥9॥   |   mahabharat अध्याय 3.310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक d1h-9
 
 
श्लोक  3.310.d1h-9 
यदा नान्यं प्रवृणुते वरं वै द्विजसत्तम:।
(विनास्य सहजं वर्म कुण्डले च विशाम्पते)।
तदैनमब्र्रवीद् भूयो राधेय: प्रहसन्निव॥ ९॥
 
 
अनुवाद
राजन! जब उन दोनों में श्रेष्ठ ने कर्ण के सुखदायक कवच और कुण्डलों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं माँगा, तब राधानन्दन कर्ण ने हँसकर उनसे कहा- ॥9॥
 
Rajan! When that best of the two did not ask for anything other than Karna's comfortable armor and earrings, then Radhanandan Karna said to them laughingly - ॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)