श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.310.42 
वैशम्पायन उवाच
लब्ध्वा कृष्णां सैन्धवं द्रावयित्वा
विप्रै: सार्धं काम्यकादाश्रमात् ते।
मार्कण्डेयाच्छ्रुतवन्त: पुराणं
देवर्षीणां चरितं विस्तरेण॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले - राजन! द्रौपदी को पाकर तथा जयद्रथ को काम्यक वन से भगाकर ले जाने के पश्चात् ब्राह्मणों सहित समस्त पाण्डवों ने मार्कण्डेयजी के मुख से पुराणों तथा देवताओं और ऋषियों के विस्तृत चरित्रों का श्रवण करते हुए यही बात सुनी थी॥42॥
 
Vaishampayanji said – King! After getting Draupadi and driving away Jayadratha from the Kamyaka forest, all the Pandavas along with the Brahmins had heard this while listening to the Puranas and the detailed characters of the gods and sages from the mouth of Markandeyaji. 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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