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श्लोक 3.310.37  |
ततो दिव्या दुन्दुभय: प्रणेदु:
पपातोच्चै: पुष्पवर्षं च दिव्यम्।
दृष्ट्वा कर्णं शस्त्रसंकृत्तगात्रं
मुहुश्चापि स्मयमानं नृवीरम्॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| कर्ण के शरीर के सभी अंग अस्त्रों से कट गए थे, फिर भी वह वीर बार-बार मुस्कुरा रहा था। यह देखकर दिव्य नगाड़े बजने लगे और आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी। 37। |
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| All the body parts of Karna were cut by the weapons, yet the brave man was smiling again and again. Seeing this, divine drums started playing and divine flowers started raining from the sky. 37. |
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