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mahabharat 3.310.32-33: हे वक्ताश्रेष्ठ कर्ण! तुम पुनः अपने पिता के समान रंग और तेज से संपन्न हो जाओगे। जब तक तुम्हारे पास अन्य अस्त्र-शस्त्र हैं और प्राण-संकट की कोई स्थिति नहीं है, तब तक यदि तुम असावधानीवश इस अमोघ शक्ति को किसी शत्रु पर छोड़ दोगे, तो वह उसे मारने के बजाय तुम पर ही गिरेगी।   |   mahabharat अध्याय 3.310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  3.310.32-33 
यादृशस्ते पितुर्वर्णस्तेजश्च वदतां वर।
तादृशेनैव वर्णेन त्वं कर्ण भविता पुन:॥ ३२॥
विद्यमानेषु शस्त्रेषु यद्यमोघामसंशये।
प्रमत्तो मोक्ष्यसे चापि त्वय्येवैषा पतिष्यति॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे वक्ताश्रेष्ठ कर्ण! तुम पुनः अपने पिता के समान रंग और तेज से संपन्न हो जाओगे। जब तक तुम्हारे पास अन्य अस्त्र-शस्त्र हैं और प्राण-संकट की कोई स्थिति नहीं है, तब तक यदि तुम असावधानीवश इस अमोघ शक्ति को किसी शत्रु पर छोड़ दोगे, तो वह उसे मारने के बजाय तुम पर ही गिरेगी।
 
O best of speakers, Karna! You will again be endowed with the same colour and brilliance as your father. As long as you have other weapons with you and there is no life-threatening situation, if you, out of negligence, release this infallible power on an enemy, it will fall on you instead of killing him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)