| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना » श्लोक 27-28 |
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| | | | श्लोक 3.310.27-28  | इन्द्र उवाच
एकं हनिष्यसि रिपुं गर्जन्तं बलिनं रणे।
त्वं तु यं प्रार्थयस्येकं रक्ष्यते स महात्मना॥ २७॥
यमाहुर्वेदविद्वांसो वरार्हमपराजितम्।
नारायणमचिन्त्यं च तेन कृष्णेन रक्ष्यते॥ २८॥ | | | | | | अनुवाद | | इन्द्र ने कहा - कर्ण! इस शक्ति से तुम युद्धस्थल में गर्जना करते हुए किसी भी एक शक्तिशाली शत्रु का वध कर सकोगे, किन्तु जिस शत्रु के लिए तुम अब यह अमोघ शक्ति माँग रहे हो, उसकी रक्षा तो परम पुरुष कर रहे हैं, जिन्हें वेदवेत्ता विद्वान पुरुषोत्तम, अपराजित, हरि और अचिन्त्य नारायण कहते हैं। उस वीर पुरुष की रक्षा स्वयं श्रीकृष्ण ही कर रहे हैं॥ 27-28॥ | | | | Indra said - Karna! With this power you will be able to kill any one powerful enemy roaring in the battlefield, but the enemy for whom you are now asking for this infallible power is protected by the Supreme Being, whom the learned scholars of Vedas call Purushottama, the undefeated, Hari and the inconceivable Narayan. It is Shri Krishna himself who is protecting that brave man.॥ 27-28॥ | | ✨ ai-generated | | |
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