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श्लोक 3.310.24  |
अमोघा हन्ति शतश: शत्रून् मम करच्युता।
पुनश्च पाणिमभ्येति मम दैत्यान् विनिघ्नत:॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| हे सूतनन्दन! जब यह अमोघ शक्ति राक्षसों का संहार करते समय मेरे हाथ से छूट जाती है, तब सैकड़ों शत्रुओं का संहार करके पुनः मेरे हाथ में आ जाती है।॥24॥ |
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| O son of Sutanandan! When this infallible power slips from my hand while killing demons, it kills hundreds of enemies and then comes back to my hand again.'॥ 24॥ |
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