श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.310.24 
अमोघा हन्ति शतश: शत्रून् मम करच्युता।
पुनश्च पाणिमभ्येति मम दैत्यान् विनिघ्नत:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
हे सूतनन्दन! जब यह अमोघ शक्ति राक्षसों का संहार करते समय मेरे हाथ से छूट जाती है, तब सैकड़ों शत्रुओं का संहार करके पुनः मेरे हाथ में आ जाती है।॥24॥
 
O son of Sutanandan! When this infallible power slips from my hand while killing demons, it kills hundreds of enemies and then comes back to my hand again.'॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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