श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.310.21 
कर्ण उवाच
वर्मणा कुण्डलाभ्यां च शक्तिं मे देहि वासव।
अमोघां शत्रुसंघानां घातिनीं पृतनामुखे॥ २१॥
 
 
अनुवाद
कर्ण ने कहा- वसु! आप कृपा करके मेरे कवच और कुण्डल ले लीजिये और मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति दीजिये जो सेना के सामने ही शत्रु सेना का नाश कर देगी।
 
Karna said- Vasu! Please take my armour and earrings and give me that infallible power of yours which will destroy the enemy forces in the front of the army.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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