श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.310.16-17 
यदि दास्यामि ते देव कुण्डले कवचं तथा।
वध्यतामुपयास्यामि त्वं च शक्रावहास्यताम्॥ १६॥
तस्माद् विनिमयं कृत्वा कुण्डले वर्म चोत्तमम्।
हरस्व शक्र कामं मे न दद्यामहमन्यथा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! यदि मैं आपको अपने कुण्डल और कवच दोनों दे दूँ, तो शत्रुओं द्वारा मेरा वध हो जाएगा और संसार में आपकी उपहास होगा। अतः (सूर्य की आज्ञा का स्मरण करके कर्ण ने कहा-) हे शंकर! आप अपनी इच्छानुसार मुझे कुछ प्रतिदान देकर मेरे कुण्डल और उत्तम कवच ले लीजिए; अन्यथा मैं उन्हें वापस नहीं दे सकता।॥16-17॥
 
Lord Indra! If I give you both my earrings and armor, then I will be killed by my enemies and you will be laughed at in the world. Therefore (Karna said remembering the order of the Sun-) O Shankar! You can give me some compensation as per your wish and take my earrings and best armor; otherwise I cannot give them back.'॥ 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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