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mahabharat 3.310.13: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इतनी विनती और अनुनय-विनय करने पर भी जब शुद्ध एवं धर्मात्मा भगवान इन्द्र ने कोई अन्य वर नहीं माँगा, तब कर्ण ने हँसकर पुनः यह कहा -॥13॥   |   mahabharat अध्याय 3.310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.310.13 
वैशम्पायन उवाच
यदान्यं न वरं वव्रे भगवान् पाकशासन:।
तत: प्रहस्य कर्णस्तं पुनरित्यब्रवीद् वच:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इतनी विनती और अनुनय-विनय करने पर भी जब शुद्ध एवं धर्मात्मा भगवान इन्द्र ने कोई अन्य वर नहीं माँगा, तब कर्ण ने हँसकर पुनः यह कहा -॥13॥
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! Even after so much pleading and pleading when the pure and virtuous Lord Indra did not ask for any other boon, then Karna smilingly said this again -॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)