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श्लोक 3.310.13  |
वैशम्पायन उवाच
यदान्यं न वरं वव्रे भगवान् पाकशासन:।
तत: प्रहस्य कर्णस्तं पुनरित्यब्रवीद् वच:॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इतनी विनती और अनुनय-विनय करने पर भी जब शुद्ध एवं धर्मात्मा भगवान इन्द्र ने कोई अन्य वर नहीं माँगा, तब कर्ण ने हँसकर पुनः यह कहा -॥13॥ |
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| Vaishmpayana says - Janamejaya! Even after so much pleading and pleading when the pure and virtuous Lord Indra did not ask for any other boon, then Karna smilingly said this again -॥ 13॥ |
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