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mahabharat 3.310.12: ‘द्विजश्रेष्ठ! यदि मैं इस सुखदायक कवच और दोनों कुण्डलों से वंचित हो जाऊँगा, तो शत्रुओं द्वारा मेरा विनाश हो जाएगा (अतः इन्हें मत माँगिए)॥12॥   |   mahabharat अध्याय 3.310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.310.12 
कुण्डलाभ्यां विमुक्तोऽहं वर्मणा सहजेन च।
गमनीयो भविष्यामि शत्रूणां द्विजसत्तम॥ १२॥
 
 
अनुवाद
‘द्विजश्रेष्ठ! यदि मैं इस सुखदायक कवच और दोनों कुण्डलों से वंचित हो जाऊँगा, तो शत्रुओं द्वारा मेरा विनाश हो जाएगा (अतः इन्हें मत माँगिए)॥12॥
 
‘Dwijashrestha! If I am deprived of this comfortable armor and both the earrings, I will be destroyed by the enemies (so do not ask for these)'. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)