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श्लोक 3.310.10  |
सहजं वर्म मे विप्र कुण्डले चामृतोद्भवे।
तेनावध्योऽस्मि लोकेषु ततो नैतज्जहाम्यहम्॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| हे ब्राह्मण! कवच मेरे शरीर के साथ ही उत्पन्न हुआ है और दोनों कुण्डल भी अमृत से उत्पन्न हुए हैं। इनके कारण मैं इस संसार में अविनाशी हूँ; अतः मैं इन सब वस्तुओं का त्याग नहीं कर सकता॥ 10॥ |
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| ‘O Brahmin! The armor was born along with my body and both the earrings were also born out of nectar. Due to these, I am indestructible in this world; hence I cannot give up all these things.॥ 10॥ |
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