श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 310: इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.310.1 
वैशम्पायन उवाच
देवराजमनुप्राप्तं ब्राह्मणच्छद्मना वृतम्।
दृष्ट्वा स्वागतमित्याह न बुबोधास्य मानसम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - 'जनमेजय! देवताओं के राजा को ब्राह्मण वेश में आते देख कर्ण ने कहा - 'ब्राह्मण! आपका स्वागत है।' किन्तु कर्ण को उस समय इन्द्र के मनोभावों का कुछ भी अनुमान नहीं था। 1.
 
Vaishmpayana says - 'Janamejaya! Seeing the King of the Gods arriving disguised as a Brahmin, Karna said - 'Brahmin! You are most welcome.' But Karna had no idea of ​​Indra's feelings at that time. 1.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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