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mahabharat 3.31.6: जो पापी मनुष्य नास्तिकता के कारण धर्म का आचरण करता है और उसमें संदेह करता है अथवा धर्म का दुहना चाहता है, अर्थात् धर्म के नाम पर अपना स्वार्थ पूरा करना चाहता है, उसे धर्म का फल बिल्कुल नहीं मिलता ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 3.31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.31.6 
न धर्मफलमाप्नोति यो धर्मं दोग्धुमिच्छति।
यश्चैनं शङ्कते कृत्वा नास्तिक्यात् पापचेतन:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो पापी मनुष्य नास्तिकता के कारण धर्म का आचरण करता है और उसमें संदेह करता है अथवा धर्म का दुहना चाहता है, अर्थात् धर्म के नाम पर अपना स्वार्थ पूरा करना चाहता है, उसे धर्म का फल बिल्कुल नहीं मिलता ॥6॥
 
The sinful man who, out of atheism, practices religion and doubts about it or wants to milk religion, that is, wants to satisfy his selfish interest in the name of religion, does not get the fruits of religion at all. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)