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mahabharat 3.31.4-5: सुश्रोणि! मैं धर्म का फल पाने के लोभ से धर्म का आचरण नहीं करता, अपितु ऋषियों के आचरण और आचरण को देखकर मेरा मन स्वाभाविक रूप से धर्म का पालन करने और शास्त्र-मर्यादा का उल्लंघन न करने में लग जाता है। द्रौपदी! जो मनुष्य कुछ पाने की इच्छा से धर्म का व्यापार करता है, वह धार्मिक लोगों की दृष्टि में हीन और निंदनीय है। 4-5॥   |   mahabharat अध्याय 3.31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  3.31.4-5 
धर्मं चरामि सुश्रोणि न धर्मफलकारणात्।
आगमाननतिक्रम्य सतां वृत्तमवेक्ष्य च॥ ४॥
धर्म एव मन: कृष्णे स्वभावाच्चैव मे धृतम्।
धर्मवाणिज्यको हीनो जघन्यो धर्मवादिनाम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सुश्रोणि! मैं धर्म का फल पाने के लोभ से धर्म का आचरण नहीं करता, अपितु ऋषियों के आचरण और आचरण को देखकर मेरा मन स्वाभाविक रूप से धर्म का पालन करने और शास्त्र-मर्यादा का उल्लंघन न करने में लग जाता है। द्रौपदी! जो मनुष्य कुछ पाने की इच्छा से धर्म का व्यापार करता है, वह धार्मिक लोगों की दृष्टि में हीन और निंदनीय है। 4-5॥
 
Sushroni! I do not practice religion out of greed to get the fruits of religion, but after seeing the conduct and behavior of sages, my mind is naturally engaged in following religion and not violating the scriptural decorum. Draupadi! The person who trades in religion with the desire to gain something is inferior and condemnable in the eyes of religious people. 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)