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mahabharat 3.31.33: हे निर्मल मुस्कान वाली द्रौपदी! यह उदाहरण पर्याप्त है। धैर्यवान पुरुष अपने कर्मों का फल पाता है और थोड़े से फल से भी संतुष्ट रहता है।॥33॥   |   mahabharat अध्याय 3.31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.31.33 
एतावदेव पर्याप्तमुपमानं शुचिस्मिते।
कर्मणां फलमाप्नोति धीरोऽल्पेनापि तुष्यति॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे निर्मल मुस्कान वाली द्रौपदी! यह उदाहरण पर्याप्त है। धैर्यवान पुरुष अपने कर्मों का फल पाता है और थोड़े से फल से भी संतुष्ट रहता है।॥33॥
 
O Draupadi with a pure smile! This example is enough. A patient man gets the fruits of his actions and is satisfied even with a little result. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)