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mahabharat 3.31.30: हे कृष्ण! यहाँ धर्म का फल देने वाला कोई न कोई देवता अवश्य है। ऐसा जानकर ही ऋषियों आदि ने धर्म का पालन किया है। धर्म ही सनातन गुण है॥30॥   |   mahabharat अध्याय 3.31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.31.30 
फलदं त्विह विज्ञाय धातारं श्रेयसि ध्रुवम्।
धर्मं ते व्यचरन् कृष्णे तद्धि श्रेय: सनातनम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे कृष्ण! यहाँ धर्म का फल देने वाला कोई न कोई देवता अवश्य है। ऐसा जानकर ही ऋषियों आदि ने धर्म का पालन किया है। धर्म ही सनातन गुण है॥30॥
 
Krishna! There is definitely a God who gives the fruits of Dharma here. Knowing this, the sages etc. have followed Dharma. Dharma is the eternal virtue. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)