Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.31.27-29: यदि तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, स्वाध्याय, दान और सरलता आदि धार्मिक आचरण निष्फल होते, तो पूर्वकाल के महान् पुरुष धर्म का आचरण न करते। यदि धार्मिक आचरण फलदायक न होते, केवल ढकोसला होते, तो ऋषि, देवता, गन्धर्व, राक्षस और राक्षस प्रभावशाली होते हुए भी आदरपूर्वक धर्म का आचरण क्यों करते?॥27-29॥ | mahabharat अध्याय 3.31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तपश्च ब्रह्मचर्यं च यज्ञ: स्वाध्याय एव च।
दानमार्जवमेतानि यदि स्युरफलानि वै॥ २७॥
नाचरिष्यन् परे धर्मं परे परतरे च ये।
विप्रलम्भोऽयमत्यन्तं यदि स्युरफला: क्रिया:॥ २८॥
ऋषयश्चैव देवाश्च गन्धर्वासुरराक्षसा:।
ईश्वरा: कस्य हेतोस्ते चरेयुर्धर्ममादृता:॥ २९॥
अनुवाद
यदि तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, स्वाध्याय, दान और सरलता आदि धार्मिक आचरण निष्फल होते, तो पूर्वकाल के महान् पुरुष धर्म का आचरण न करते। यदि धार्मिक आचरण फलदायक न होते, केवल ढकोसला होते, तो ऋषि, देवता, गन्धर्व, राक्षस और राक्षस प्रभावशाली होते हुए भी आदरपूर्वक धर्म का आचरण क्यों करते?॥27-29॥
If religious practices like austerity, celibacy, sacrifices, self-study, charity and simplicity were fruitless, then the great and greater men of the past would not have practised religion. If religious practices did not bear any fruit and were all mere fraud, then why would the sages, gods, Gandharvas, demons and devils, despite being influential, respectfully practise religion?॥ 27-29॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥