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mahabharat 3.31.18: जो धर्म में संदेह करता है, उसकी शुद्धि का कोई प्रायश्चित नहीं है। वह बेचारा पापी मनुष्य जो धर्म के विरुद्ध विचार करता है, उत्तम लोकों को प्राप्त नहीं होता, अर्थात् अधोलोक को प्राप्त होता है। 18॥   |   mahabharat अध्याय 3.31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.31.18 
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति यो धर्ममभिशङ्कते।
ध्यायन् स कृपण: पापो न लोकान् प्रतिपद्यते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो धर्म में संदेह करता है, उसकी शुद्धि का कोई प्रायश्चित नहीं है। वह बेचारा पापी मनुष्य जो धर्म के विरुद्ध विचार करता है, उत्तम लोकों को प्राप्त नहीं होता, अर्थात् अधोलोक को प्राप्त होता है। 18॥
 
There is no atonement for the purification of one who doubts about religion. That poor sinful man who thinks against religion does not attain the best worlds, that is, he attains the lower world. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)