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mahabharat 3.31.17: जो उद्दण्ड मनुष्य केवल अपनी बुद्धि पर विश्वास करता है, वह श्रेष्ठ पुरुषों और श्रेष्ठ धर्म की उपेक्षा करता है; क्योंकि वह केवल इस दृश्य जगत् की सत्ता को ही मानता है, जो मूढ़ इन्द्रियों की आसक्ति से सम्बन्ध रखता है। उसकी बुद्धि परोक्ष पदार्थों के विषय में मोहित हो जाती है। 17॥   |   mahabharat अध्याय 3.31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 31: युधिष्ठिरद्वारा द्रौपदीके आक्षेपका समाधान तथा ईश्वर, धर्म और महापुरुषोंके आदरसे लाभ और अनादरसे हानि  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.31.17 
आत्मप्रमाण उन्नद्ध: श्रेयसो ह्यवमन्यक:।
इन्द्रियप्रीतिसम्बद्धं यदिदं लोकसाक्षिकम्।
एतावन्मन्यते बालो मोहमन्यत्र गच्छति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो उद्दण्ड मनुष्य केवल अपनी बुद्धि पर विश्वास करता है, वह श्रेष्ठ पुरुषों और श्रेष्ठ धर्म की उपेक्षा करता है; क्योंकि वह केवल इस दृश्य जगत् की सत्ता को ही मानता है, जो मूढ़ इन्द्रियों की आसक्ति से सम्बन्ध रखता है। उसकी बुद्धि परोक्ष पदार्थों के विषय में मोहित हो जाती है। 17॥
 
A defiant man who believes only in his intellect disregards the best men and the best religion; Because he accepts only the authority of this visible world which is related to the attachment of foolish senses. His intellect gets deluded regarding indirect things. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)