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mahabharat 3.308.27: उसके शरीर पर दिव्य कवच और कानों में कुण्डल अमृत से उत्पन्न हुए थे। वे ही उस प्रजापति के रचे हुए देवपुत्र को जीवित रखे हुए थे॥27॥   |   mahabharat अध्याय 3.308: कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 308: कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.308.27 
अमृतादुत्थितं दिव्यं तनुवर्म सकुण्डलम्।
धारयामास तं गर्भं दैवं च विधिनिर्मितम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
उसके शरीर पर दिव्य कवच और कानों में कुण्डल अमृत से उत्पन्न हुए थे। वे ही उस प्रजापति के रचे हुए देवपुत्र को जीवित रखे हुए थे॥27॥
 
The divine armour on his body and the earrings in his ears were created from nectar. They were the ones that were keeping alive that son of a god, created by the Creator.॥ 27॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि कर्णपरित्यागे अष्टाधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३०८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कर्णपरित्यागविषयक तीन सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)