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mahabharat 3.308.10: वह बोली, 'हे बालक! जलचर, थलचर, नभचर और देवलोक के प्राणी तुम्हें आशीर्वाद दें॥ 10॥   |   mahabharat अध्याय 3.308: कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 308: कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.308.10 
स्वस्ति ते चान्तरिक्षेभ्य: पार्थिवेभ्यश्च पुत्रक।
दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यस्तथा तोयचराश्च ये॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वह बोली, 'हे बालक! जलचर, थलचर, नभचर और देवलोक के प्राणी तुम्हें आशीर्वाद दें॥ 10॥
 
She said, 'My child! May the aquatic, terrestrial, aerial and celestial beings bless you.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)