श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 307: सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  3.307.6-7 
वैशम्पायन उवाच
सा वै शापपरित्रस्ता बहु चिन्तयती हृदा।
मोहेनाभिपरीताङ्गी स्मयमाना पुन: पुन:॥ ६॥
तं देवमब्रवीद् भीता बन्धूनां राजसत्तम।
व्रीडाविह्वलया वाचा शापत्रस्ता विशाम्पते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! कुन्ती श्राप से अत्यन्त भयभीत होकर मन में नाना प्रकार की बातें सोच रही थी। उसके शरीर के सभी अंग मोह से भर गए थे। वह बार-बार आश्चर्यचकित हो रही थी। एक ओर तो वह श्राप से भयभीत थी, दूसरी ओर अपने भाइयों से भी डर रही थी। हे राजन! उस अवस्था में वह लज्जा के कारण काँपती हुई वाणी में सूर्यदेव से बोली।
 
Vaishampayana says - O best of kings! Kunti was very afraid of the curse and was thinking various things in her mind. All her body parts were filled with fascination. She was surprised again and again. On one hand she was terrified of the curse and on the other hand she was afraid of her brothers. O King! In that condition she spoke to the Sun God in a shaky voice due to shame.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)