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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 307: सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.307.5 
साहमद्य भृशं भीता गृहीता च करे भृशम्।
कथं त्वकार्यं कुर्यां वै प्रदानं ह्यात्मन: स्वयम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
परंतु आज मैं अत्यन्त भयभीत होकर भगवान सूर्यदेव के हाथों में पड़ गया हूँ, फिर भी मैं अपना शरीर दान देने जैसा नीच कर्म कैसे कर सकता हूँ?’ 5॥
 
But today I am very frightened and have fallen into the hands of Lord Suryadev, yet how can I do such a despicable act as giving away my body?' 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)