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mahabharat 3.307.23: वैशम्पायनजी कहते हैं: 'हे जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर राहु के शत्रु सूर्यदेव आकाश में भ्रमण करते हुए योगबल से कुन्ती के शरीर में प्रविष्ट हुए और उसकी नाभि का स्पर्श किया॥ 23॥   |   mahabharat अध्याय 3.307: सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 307: सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.307.23 
वैशम्पायन उवाच
तथेत्युक्त्वा तु तां कुन्तीमाविवेश विहङ्गम:।
स्वर्भानुशत्रुर्योगात्मा नाभ्यां पस्पर्श चैव ताम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: 'हे जनमेजय! तब 'बहुत अच्छा' कहकर राहु के शत्रु सूर्यदेव आकाश में भ्रमण करते हुए योगबल से कुन्ती के शरीर में प्रविष्ट हुए और उसकी नाभि का स्पर्श किया॥ 23॥
 
Vaishmpayana says: 'O Janamejaya! Then saying 'very good', the Sun, the enemy of Rahu and travelling in the sky, entered Kunti's body in the form of yoga and touched her navel.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)