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mahabharat 3.307.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार राजकुमारी मनस्विनी कुन्ती अनेक प्रकार से मधुर वचन कहकर समझाने पर भी भगवान सूर्य को मनाने में सफल नहीं हो सकीं॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.307: सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 307: सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.307.1 
वैशम्पायन उवाच
सा तु कन्या बहुविधं ब्रुवन्ती मधुरं वच:।
अनुनेतुं सहस्रांशुं न शशाक मनस्विनी॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार राजकुमारी मनस्विनी कुन्ती अनेक प्रकार से मधुर वचन कहकर समझाने पर भी भगवान सूर्य को मनाने में सफल नहीं हो सकीं॥1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! In this way, princess Manaswini Kunti could not succeed in persuading Lord Surya even after persuading her by saying sweet words in various ways. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)