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mahabharat 3.306.5: सुमध्यमा कुन्ती को सुबह-शाम उगते सूर्य को देखते हुए किसी प्रकार की गर्मी का अनुभव नहीं होता था। उसका मन और आँखें उसी में लीन हो जाती थीं।   |   mahabharat अध्याय 3.306: कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 306: कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.306.5 
तत्र बद्धमनोदृष्टिरभवत् सा सुमध्यमा।
न चातप्यत रूपेण भानो: संध्यागतस्य सा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सुमध्यमा कुन्ती को सुबह-शाम उगते सूर्य को देखते हुए किसी प्रकार की गर्मी का अनुभव नहीं होता था। उसका मन और आँखें उसी में लीन हो जाती थीं।
 
Sumadhyama Kunti did not feel any heat while looking at the rising sun in the morning and evening. Her mind and eyes became absorbed in it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)