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mahabharat 3.306.25: सूर्यदेव बोले - हे कुन्तीभोजपुत्री कुन्ती! मैं तुमसे इतनी विनती केवल इसलिए कर रहा हूँ कि मैं तुम्हें बालक मानता हूँ। किसी अन्य स्त्री को मुझसे विनती करने का अवसर नहीं मिल सकता। हे डरपोक! अपना शरीर मुझे अर्पित कर दो। ऐसा करने से ही तुम्हें शांति मिलेगी॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 3.306: कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 306: कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती-सूर्य-संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.306.25 
सूर्य उवाच
बालेति कृत्वानुनयं तवाहं
ददानि नान्यानुनयं लभेत।
आत्मप्रदानं कुरु कुन्तिकन्ये
शान्तिस्तवैवं हि भवेच्च भीरु॥ २५॥
 
 
अनुवाद
सूर्यदेव बोले - हे कुन्तीभोजपुत्री कुन्ती! मैं तुमसे इतनी विनती केवल इसलिए कर रहा हूँ कि मैं तुम्हें बालक मानता हूँ। किसी अन्य स्त्री को मुझसे विनती करने का अवसर नहीं मिल सकता। हे डरपोक! अपना शरीर मुझे अर्पित कर दो। ऐसा करने से ही तुम्हें शांति मिलेगी॥ 25॥
 
The Sun God said - Kunti Bhoja's daughter Kunti! I am pleading with you so much only because I consider you a child. No other woman can get the opportunity to plead with me. You timid one! Offer your body to me. Only by doing this can you get peace.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)