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श्लोक 3.305.21-22  |
तं प्रदाय तु राजेन्द्र कुन्तिभोजमुवाच ह।
उषितोऽस्मि सुखं राजन् कन्यया परितोषित:॥ २१॥
तव गेहेषु विहित: सदा सुप्रतिपूजित:।
साधयिष्यामहे तावदित्युक्त्वान्तरधीयत॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! पृथा को वह मन्त्र देकर ब्राह्मण ने राजा कुन्तीभोज से कहा - 'राजन! मैं आपकी पुत्री द्वारा आदरपूर्वक तथा संतुष्ट होकर सदैव आपके घर में सुखपूर्वक रहता आया हूँ। अब हम अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए यहाँ से प्रस्थान करेंगे।' ऐसा कहकर वह ब्राह्मण वहाँ से अन्तर्धान हो गया। |
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| King! After giving that mantra to Pritha, the Brahmin said to King Kunti Bhoja - 'King! I have always lived happily in your house, being respected and satisfied by your daughter. Now we will leave from here to achieve our goal.' Saying this, the Brahmin disappeared from there. 21-22. |
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