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mahabharat 3.305.20: राजन! तब उस ब्राह्मण ने निर्दोष अंगों वाली कुन्ती को अथर्ववेदीय उपनिषद् में प्रसिद्ध मन्त्रसमूह का उपदेश किया॥20॥   |   mahabharat अध्याय 3.305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.305.20 
ततस्तामनवद्याङ्गीं ग्राहयामास स द्विज:।
मन्त्रग्रामं तदा राजन्नथर्वशिरसि श्रुतम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
राजन! तब उस ब्राह्मण ने निर्दोष अंगों वाली कुन्ती को अथर्ववेदीय उपनिषद् में प्रसिद्ध मन्त्रसमूह का उपदेश किया॥20॥
 
Rajan! Then the Brahmin preached the group of mantras which is famous in the Atharva Vedic Upanishad to Kunti, who had flawless limbs. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)