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mahabharat 3.305.19: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! धर्मपरायण पृथा उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के अनुरोध को दूसरी बार अस्वीकार न कर सकी, क्योंकि उसे ऐसा करने पर उसके शाप का भय था।   |   mahabharat अध्याय 3.305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.305.19 
वैशम्पायन उवाच
न शशाक द्वितीयं सा प्रत्याख्यातुमनिन्दिता।
तं वै द्विजातिप्रवरं तदा शापभयान्नृप॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! धर्मपरायण पृथा उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के अनुरोध को दूसरी बार अस्वीकार न कर सकी, क्योंकि उसे ऐसा करने पर उसके शाप का भय था।
 
Vaishmpayana says - O King! The pious Pritha could not refuse the request of that great Brahmin for the second time because she was afraid of his curse if she did so.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)