श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.305.18 
अकामो वा सकामो वा स समेष्यति ते वशे।
विबुधो मन्त्रसंशान्तो भवेद् भृत्य इवानत:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वह देवता चाहे निष्काम हो अथवा कामनायुक्त, वह मन्त्र के प्रभाव से शान्त है, वह विनीत सेवक की भाँति तुम्हारे पास आएगा और तुम्हारे वश में हो जाएगा ॥18॥
 
Whether that god is desireless or has desires, he is peaceful due to the influence of mantra, he will come to you like a humble servant and will be under your control. 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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