श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.305.17 
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि।
तेन तेन वशे भद्रे स्थातव्यं ते भविष्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे भद्रे! इस मंत्र से तुम जिस भी देवता का आह्वान करोगे, वह तुम्हारी शरण में आने को विवश हो जाएगा॥17॥
 
Bhadre! Whichever deity you invoke with this mantra will be forced to surrender to you.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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