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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.305.11 
तं सा परममित्येव प्रत्युवाच यशस्विनी।
तत: प्रीतिमवापाग्रॺां कुन्तिभोजो महामना:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वह महायज्ञ कन्या उत्तर देती, "हाँ, पिताजी! वे बहुत प्रसन्न हैं।" यह सुनकर महाबली कुंतीभोज को बहुत प्रसन्नता होती।
 
That illustrious daughter would reply to him, "Yes, father! He is very happy." On hearing this, the great Kunti Bhoja would feel very happy. 11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)