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mahabharat 3.305.10: जनमेजय! पिता कुन्तीभोज प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल पूछा करते थे - 'पुत्री! क्या ब्राह्मण तुम्हारी सेवा से संतुष्ट हैं?'॥10॥   |   mahabharat अध्याय 3.305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.305.10 
तां प्रभाते च सायं च पिता पप्रच्छ भारत।
अपि तुष्यति ते पुत्रि ब्राह्मण: परिचर्यया॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! पिता कुन्तीभोज प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल पूछा करते थे - 'पुत्री! क्या ब्राह्मण तुम्हारी सेवा से संतुष्ट हैं?'॥10॥
 
Janamejaya! Father Kunti Bhoja used to ask every day in the morning and evening - 'Daughter! Is the Brahmin satisfied with your service?'॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)