Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.305.1: वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! इस प्रकार कन्या पृथा शुद्ध मन से कठोर व्रत का पालन करती हुई उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपनी सेवा से संतुष्ट रखने लगी।   |   mahabharat अध्याय 3.305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 305: कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.305.1 
वैशम्पायन उवाच
सा तु कन्या महाराज ब्राह्मणं संशितव्रतम्।
तोषयामास शुद्धेन मनसा संशितव्रता॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! इस प्रकार कन्या पृथा शुद्ध मन से कठोर व्रत का पालन करती हुई उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपनी सेवा से संतुष्ट रखने लगी।
 
Vaishmpayana says - Maharaj! In this way, the girl Pritha, while observing a strict fast with a pure heart, began to keep that great Brahmin satisfied by her services. 1.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)