श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 304: कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.304.15 
द्विजातयो महाभागा वृद्धबालतपस्विषु।
भवन्त्यक्रोधना: प्रायो ह्यपराद्धेषु नित्यदा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई वृद्ध, बालक या तपस्वी भी अपराध कर बैठे, तो भी आप जैसे भाग्यशाली ब्राह्मण उन पर कभी क्रोध नहीं करते॥15॥
 
Even if an old person, a child or an ascetic commits a crime, a very fortunate brahmin like you never gets angry at them.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)