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mahabharat 3.303.28: हे सुन्दर आत्मवान पृथे! यदि तुम अहंकार, अभिमान और मान त्यागकर इस वरदाता ब्राह्मण की पूजा करोगे, तो परम कल्याण के भागी होगे॥28॥   |   mahabharat अध्याय 3.303: कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.303.28 
सा त्वं दर्पं परित्यज्य दम्भं मानं च भाविनि।
आराध्य वरदं विप्रं श्रेयसा योक्ष्यसे पृथे॥ २८॥
 
 
अनुवाद
हे सुन्दर आत्मवान पृथे! यदि तुम अहंकार, अभिमान और मान त्यागकर इस वरदाता ब्राह्मण की पूजा करोगे, तो परम कल्याण के भागी होगे॥28॥
 
‘Beautiful soulful Prithe! If you give up arrogance, pride and honor and worship this boon-giving Brahmin, you will be a partaker of ultimate welfare. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)