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mahabharat 3.303.21: हे निर्दोष अंगों वाली पुत्री! नगर में, अन्तःपुर में, यहाँ तक कि सेवकों में भी ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो तुम्हारे उत्तम आचरण से संतुष्ट न हो॥ 21॥   |   mahabharat अध्याय 3.303: कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 303: कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.303.21 
न ह्यतुष्टो जनोऽस्तीह पुरे चान्त:पुरे च ते।
सम्यग्वृत्त्यानवद्याङ्गि तव भृत्यजनेष्वपि॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे निर्दोष अंगों वाली पुत्री! नगर में, अन्तःपुर में, यहाँ तक कि सेवकों में भी ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो तुम्हारे उत्तम आचरण से संतुष्ट न हो॥ 21॥
 
O daughter with flawless body parts! There is no person in the city or in the inner chambers, even among the servants, who is not satisfied with your good behaviour. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)