श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 303: कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.303.17 
अमानयन् हि मानार्हान् वातापिश्च महासुर:।
निहतो ब्रह्मदण्डेन तालजङ्घस्तथैव च॥ १७॥
 
 
अनुवाद
पूज्य ब्राह्मणों का आदर न करने के कारण ही महादैत्य वातापि और इसी प्रकार तालजंघ ब्रह्मदण्ड से मारे गए ॥17॥
 
It was because of not respecting the honorable Brahmins that the great demon Vatapi and in the same way Taljangha were killed by Brahmadanda. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)