श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 303: कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.303.16 
ब्राह्मणो हि परं तेजो ब्राह्मणो हि परं तप:।
ब्राह्मणानां नमस्कारै: सूर्यो दिवि विराजते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि ब्राह्मण ही सर्वश्रेष्ठ तेजस्वरूप है, ब्राह्मण ही परम तप है, ब्राह्मणों के नमस्कार से ही सूर्यदेव आकाश में चमकते हैं॥16॥
 
Because Brahmin is the best form of radiance, Brahmin is the ultimate penance, it is because of the salutations of Brahmins that the Sun God shines in the sky.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)