श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 303: कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.303.15 
अयं तपस्वी भगवान् स्वाध्यायनियतो द्विज:।
यद् यद् ब्रूयान्महातेजास्तत्तद् देयममत्सरात्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यह ब्राह्मण अत्यंत तेजस्वी, तपस्वी, धनवान और नियमित रूप से वेदों का अध्ययन करने वाला है। यह जो कुछ भी मांगे, उसे ईर्ष्या रहित और भक्तिपूर्वक दे दो॥15॥
 
‘This Brahmin is very radiant, ascetic, wealthy and regularly engaged in the study of the Vedas. Whatever he asks for, give it to him without any jealousy and with devotion.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)